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मंगळवार, ५ एप्रिल, २०११

दत्ता म्हणे

एक

उदासिन वृत्ती, धरावी अंतरी।
समत्वे बाहेरी, निजरुप।।
मानपान नेणे, नेणे शत्रु-मित्र।
जाणा तो पवित्र, संसारात।।
मोह ममतेचे नाही पाश मनी।
केवळ उन्मनी भोगतसे।।
दत्ता म्हणे ऐसा आचरी जीवन।
वंदिन चरण जिवेभावे।।

दोन
सबाह्य अंतरी विठ्ठल कोंदला।
सोहळा देखला निजरुपी।।
भक्त काजासाठी धरीले सगुणे।
परि व्यापकपणे नटलाशी।।
देवादिका ना कळे तुझे हे स्वरुप।
जाणला मी बाप विटेवरी।।
दत्ता म्हणे ऐसा राजा कनवाळु।
करितो सांभाळु भक्तजना।।

तीन
नलगे नलगे मुक्तिचा सोहळा।
आवडे कृपाळा येरझार।।
जन्मोजन्मी तुझा होईन मी दास।
हेचि माझी आस पुरवावी।।
नामघोष कानी आवडतो देवा।
पडे याचा हेवा ब्रह्मादिका।।
दत्ता म्हणे तुचि प्राणाचा विसावा।
माधव केशवा पद्मनाभा।।
चार

प्रभु तुझी माया न कळे कवणा।
व्यापक विचक्षणा दाखविशी।।
जरी तु व्यापिले सकळ जगत।
असे गुणातित रुप तुझे।।
साऱ्या जगताचा तुची बा विसावा।
घडे बद्ध जीवा आत्मबोध।।
दत्ता म्हणे जाणा भक्त तोची खरा।
मायेचा पसारा पार करी।।

पाच
सकल भ्रमले मायेत रमले।
मन भोगा गुंतले विषयांच्या।।
भाव भक्ति ठाव नाही जयापरी।
अधिनता परि वासनेच्या।।
संत वचनांशी वावडे तयाशी।
नसे तयापाशी नारायण।।
दत्ता म्हणे व्हारे सावध सावध।
करा आत्मबोध गुरुपाशी।।

सहा

सद्गुरु कृपा बंधनाशी तोडी।
मायेशी मरोडी भवताप।।

असे भाग्यवंत दैवाचे दैवाचे।
पंढरीरायाचे दास आम्ही।।

बंधन तोडिले उकलोनी गाठी।
तोचि जगजेठी डोळा दिसे।।

दत्ता म्हणे ऐसी सद्गुरुंची लीला।
भोगतसे सोहळा आपणची।।
 
सात
 
पाहे पाहे विठु पाहे।
सर्वाभुति वास राहे।।
 
ज्ञानदृष्टी दाटे डोळा।
असा पवित्र सोहळा।।
 
असे सगुण बरवे।
प्रेमे चराचरी राहे।।
 
दत्ता म्हणे पाहा याशी।
वास आपणया पाशी।।
 
आठ
 
पाहता पाहता एकरुप झालो।
दशदिशा ठालो कौतुकाने।।
 
बोलता बोलता मौनाशी पावलो।
श्रवणाशी आलो अनाहत।।
 
सबाह्य अंतरी एक निजबोध।
नाशियेली बाध विषयांची।।
 
दत्ता जाणे ह्रद सकल जीवांचे।
एक कैवल्याचे रुप जगी।।
 
नऊ
 
जगत संसार मृगजळ भासे।
तया मुळी दिसे ब्रह्मरुप।।
 
अविद्या ही जाणा विस्तार जगाचा।
आत्मज्ञाने साचा बिजनाश।।
 
वासना निमाली ठाईची ह्रदयी।
तेणे रुप पाही ऐक्यरसी।।
 
दत्ता म्हणे जळे कर्माचे बंधन।
हाचि जन्म जाण शेवटला।।
 
दहा
 
विश्वरुप जे पार्थाशी।
तेचि दाविले आम्हासी।।
 
धन्य धन्य गुरुराया।
तुज ओवाळिन काया।।
 
अनुग्रहे केली मात।
प्रेमे झालो गुणातित।।
 
त्रिपुटी ही एक झाली।
ऐक्य कौतुके पाहिली।।
 
दत्ता पाही निजरुप।
वसे चराचरी बाप।।
 
अकरा
 
गोड तुझे नाम देवा।
हरि मुरारी केशवा।।
 
नसे बंधन काळाचे।
स्मरे पाय विठोबाचे।।
 
ध्यानी मनी वसे हरि।
स्वप्न जागृती बाहेरी।।
 
दत्ता म्हणे अनुभवा।
याशी जाणा नित नवा।।
 
बारा
 
जन्म होता मुक्त झालो।
हरि भजनांशी आलो।।
 
आवडिने घ्यावे नाम।
तेणे तुष्टे घनःश्याम।।
 
जन्मोजन्मी घडो सेवा।
पडे ब्रह्मादिका हेवा।।
 
दत्ता सांगे सकलांशी।
प्रेमे स्मरा रे हरिशी।।
 
तेरा
 
नसे मी मोठा कोणी।
या साऱ्या जनीवनी।।
 
संत चरणांचा दास।
मी राहतो उदास।।
 
विकारांचा मी कल्लोळ।
पडे जीवा कशी भुल।।
 
मी दास संता पायी।
दत्ता म्हणे उगा राही।।
 
चौदा
 
करा सद्गुरु सोयरा।
झणी त्याची कास धरा।।
 
तोचि तारक तारक।
पडे कळीकाळा धाक।।
 
आत्मज्ञान घडवितो।
देहभोग नासवितो।।
 
दत्ता म्हणे जागा होई।
सद्गुरु शरण जाई।।
 
पंधरा
 
राम तोचि आत्माराम।
सकल जीवांचा आराम।।
 
राम ध्याई राम गाई।
राम सर्वाभुति राही।।
 
रामा गोविंदा माधवा।
हाचि योग्यांचा विसावा।।
 
दत्ता म्हणे राम म्हणा।
नाही पुण्याची गणना।।
 
सोळा
 
गुरु कृपेची पहाट।
चारी वाचा एकवट।।
 
रामनाम घेता वाचे।
नाशे बिज हे कर्माचे।।
 
रामनाम आदिजप।
हरवितो भवताप।।
 
दत्ता सांगे सकलांशी।
प्रेमे स्मरा श्रीरामाशी।।
 
सतरा
 
जन्मा आलाशी रे नरा।
घेई रामनाम खरा।।
 
तेणे तुटेल बंधन।
करी बापा हे साधन।।
 
नसे क्षण भरवसा।
पुढे काळा हाती फासा।।
 
दत्ता म्हणे वेगु करा।
रामनाम मनी स्मरा।।
 
अठरा
 
नाम फुकाचे फुकाचे।
तरी का न घेई वाचे।।
 
मोहपाशा गुंतियेला।
कामभोगा आकळीला।।
 
वाणी निंदती सज्जना।
लाज कशी नये मना।।
 
दत्ता म्हणे मार्ग सोपा।
तरी का न दिसे बापा।।